शान्ति पर्व  अध्याय १२३

कामन्द उवाच

प्रज्ञाप्रणाशको मोहस्तथा धर्मार्थनाशकः |  १५   क
तस्मान्नास्तिकता चैव दुराचारश्च जाय़ते ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति