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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वाभिमानिनी |  १८५   क
न धर्मसङ्करकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता ||  १८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति