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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु तु यः सदा |  १०५   क
वरान्स कामाँल्लभते प्रसन्ने त्र्यम्वके नरः ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति