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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरम् |  ४४   क
उत्सृजन्परिगृह्णंश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति