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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्याध उवाच
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालय़न् |  १५   क
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते |  १५   ख
भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति