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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे; ततोनिमित्ते च फले विनष्टे |  ४६   क
अलेपमाकाशमलिङ्गमेव; मास्थाय़ पश्यन्ति महद्ध्यसक्ताः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति