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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदविन्दुभिः |  ९७   क
सुश्लिष्टानि तथा राजन्प्राणिनामिह सम्भवः ||  ९७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति