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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
शव्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रिय़ाणि च |  ९८   क
पृथगात्मा दशात्मानः संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति