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शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
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भीष्म उवाच
उष्णां वैतरणीं महानदी; मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः |  ३१   क
परशुवनशय़ो निपतितो; वसति च महानिरय़े भृशार्तः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति