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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
अनुवत्स्यन्ति चापीमाः समेषु विषमेषु च |  १४   क
प्रजाः कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवाञ्शीलभूषणान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति