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शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
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भीष्म उवाच
इह लोके हि धनिनः परोऽपि स्वजनाय़ते |  ८६   क
स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामेव नश्यति ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति