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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
ततः समुद्ग्रथ्य सितेन वाससा; स्वमूर्धजानव्यथितः स्थितोऽर्जुनः |  १९   क
विभाति सम्पूर्णमरीचिभास्वता; शिरोगतेनोदय़पर्वतो यथा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति