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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
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नारद उवाच
विवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति |  २८   क
सृञ्जय़स्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतो ददौ ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति