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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
सुरामैरेय़मिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह |  १२   क
दीनान्धकृपणादिभ्यो दीय़मानेन चानिशम् |  १२   ख
वभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरेः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति