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द्रोण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
तस्य जिह्ममभिप्राय़ं ज्ञात्वा द्रोणोऽर्थतत्त्ववित् |  १९   क
तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ सञ्चिन्त्य वुद्धिमान् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति