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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तच्छ्रुत्वा तु सङ्क्रुद्धः सर्वय़क्षगणाधिपः |  २१   क
कोपसंरक्तनय़नः कथमित्यव्रवीद्वचः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति