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अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
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राजो उवाच
ततः स कवची धन्वी वाणी दीप्त इवानलः |  ३१   क
प्रय़यौ स धनुर्धुन्वन्विवर्षुरिव तोय़दः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति