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शान्ति पर्व
अध्याय ५७
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भीष्म उवाच
त्रय़्या संवृतरन्ध्रश्च राजा भवितुमर्हति |  १४   क
वृजिनस्य नरेन्द्राणां नान्यत्संवरणात्परम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति