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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्याय़ेणोपसेवते |  १३   क
नात्यन्तमसुखं कश्चित्प्राप्नोति पुरुषर्षभ ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति