अनुशासन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

मय़ापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभुः |  ७२   क
साक्षात्पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ||  ७२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति