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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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धृतराष्ट्र उवाच
शमकामः सदा पार्थो दीर्घप्रेक्षी युधिष्ठिरः |  १३   क
अशक्त इति मन्वानैः पुत्रैर्मम निराकृतः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति