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अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
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राजो उवाच
भृगोर्वचनमात्रेण स च व्रह्मर्षितां गतः |  ५४   क
वीतहव्यो महाराज व्रह्मवादित्वमेव च ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति