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अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
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राजो उवाच
ऋग्वेदे वर्तते चाग्र्या श्रुतिरत्र विशां पते |  ५६   क
यत्र गृत्समदो व्रह्मन्व्राह्मणैः स महीय़ते ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति