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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
शाकमूलफलैर्वापि येन वर्तय़ते स्वय़म् |  ५०   क
तद्वै दद्याद्व्राह्मणाय़ श्रद्धावाननसूय़कः |  ५०   ख
तेनैव प्राप्नुय़ात्प्राज्ञो हय़मेधफलं नरः ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति