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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
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वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो मेने हर्षवाष्पाविलेक्षणः |  १८   क
राजात्मानं गृहगतं पुरेव गजसाह्वय़े ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति