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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
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वैशम्पाय़न उवाच
आश्रमं ते ततो जग्मुर्धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः |  ३   क
शून्यं मृगगणाकीर्णं कदलीवनशोभितम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति