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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
न निर्मन्युः क्षत्रिय़ोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् |  ३४   क
तदद्य त्वय़ि पश्यामि क्षत्रिय़े विपरीतवत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति