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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
परिवृत्तेऽहनि ततः प्रकीर्णहरिणे वने |  २५   क
काञ्चनैर्विमलैः पद्मैर्ददर्श विपुलां नदीम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति