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वन पर्व
अध्याय ३१
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द्रौपद्यु उवाच
नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च |  २   क
पुरुषः श्रिय़माप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति