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वन पर्व
अध्याय ३१
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द्रौपद्यु उवाच
यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुनः |  ३४   क
अय़सा चाप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति