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वन पर्व
अध्याय ३१
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द्रौपद्यु उवाच
धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते |  ५   क
व्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यपि च देवताः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति