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वन पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
भक्तानुरक्ताः सुहृदः सदा प्रिय़हिते रतान् |  २०   क
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति