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विराट पर्व
अध्याय ३१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतिय़ाय़ समन्ततः |  २०   क
शरान्व्यसृजतां शीघ्रं तोय़धारा घनाविव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति