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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदितं सर्वं वलमासीद्विशां पते |  ३३   क
पाण्डवानां जय़ं दृष्ट्वा युद्धाय़ च मनो दधे ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति