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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
हन्ति स्मात्र पिता पुत्रं रथेनाभ्यतिवर्तते |  १९   क
पुत्रश्च पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति