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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
सासिर्वाहुर्निपतितः शिरश्छिन्नं सकुण्डलम् |  २१   क
गजेनाक्षिप्य वलिना रथः सञ्चूर्णितः क्षितौ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति