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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशदन्यमन्योऽत्र तथान्यो विमुखोऽद्रवत् |  २८   क
अन्यः प्राप्तस्य चान्यस्य शिरः काय़ादपाहरत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति