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विराट पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ रात्रौ सा विहाय़ शय़नं स्वकम् |  ५   क
प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती |  ५   ख
दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति