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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणोऽभिसङ्क्रुद्धो विसृजञ्शतशः शरान् |  ३९   क
चेदिपाञ्चालपाण्डूनामकरोत्कदनं महत् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति