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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च |  ५२   क
शरौघाञ्शरजालेन विदुधाव धनञ्जय़ः |  ५२   ख
अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद्विसृजञ्शरान् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति