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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्चापि राधेय़ं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |  ५८   क
कर्णादवरजं वाणैर्जघान निशितैस्त्रिभिः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति