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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
पुनः स्वरथमास्थाय़ धनुरादाय़ चापरम् |  ६२   क
विव्याध दशभिः कर्णं सूतमश्वांश्च पञ्चभिः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति