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आदि पर्व
अध्याय १८
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सूत उवाच
एवं ते समय़ं कृत्वा दासीभावाय़ वै मिथः |  ५   क
जग्मतुः स्वगृहानेव श्वो द्रक्ष्याव इति स्म ह ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति