वन पर्व  अध्याय ४९

वैशम्पाय़न उवाच

स क्षत्रधर्मविद्राजन्मा धर्म्यान्नीनशः पथः |  १४   क
प्राग्द्वादश समा राजन्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति