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कर्ण पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव तत्रासीच्छरवृष्टिभिरम्वरे |  ४९   क
समावृत्तैर्नरवरैर्निघ्नद्भिरितरेतरम् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति