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कर्ण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
नागाश्वरथपत्त्यौघांस्तावकान्समभिघ्नतः |  ५२   क
ध्वजाग्रं दृश्यते त्वस्य ज्याशव्दश्चापि श्रूय़ते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति