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कर्ण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
अद्य द्रष्टासि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |  ५३   क
निघ्नन्तं शात्रवान्सङ्ख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति