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कर्ण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
एष संशप्तकाहूतस्तानेवाभिमुखो गतः |  ५६   क
करोति कदनं चैषां सङ्ग्रामे द्विषतां वली |  ५६   ख
इति व्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्राहातिमन्युमान् ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति