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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्रातुर्निय़ोगात्तु युधिष्ठिरस्य; वनादसौ वारणमत्तगामी |  १५   क
यत्काम्यकात्प्रव्रजितः स जिष्णु; स्तदैव ते शोकहता वभूवुः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति