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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
अद्य वः सरथान्साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन् |  १७   क
नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसङ्क्षय़े |  १७   ख
तेजसा नाशय़िष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति